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Saturday, 21 March 2020

इतनी बड़ी सज़ा

इतनी बड़ी सज़ा
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    शहर की उस तंग गली में सुबह से ही तवायफ़ों के ऊपर तेजाब फेंके जाने से कोहराम मचा था। मौके पर तमाशाई जुटे हुये थे। कुछ उदारमना लोग यह हृदयविदारक दृश्य देख  -- " हरे राम- हरे राम ! कैसा निर्दयी इंसान था.. !  सिर्फ़ इतना कह कन्नी काट ले रहे थे। "   
           एक दरिंदा जो इसी इलाके का हिस्ट्रीशीटर था। उसने इन चारों में से सबसे ख़ूबसूरत तवायफ़ को हिदायत दे रखी थी कि वह सिर्फ़ उसकी है। जिसके प्रतिउत्तर में तवायफ़ ने इतना ही कहा था--  उनके धंधे में सारे ग्राहक एक जैसे हैं और वे अपने सौदे में मिलावट नहीं किया करती हैं । इसी से नाराज वह युवक रात में छत की मुंडेर पर चढ़कर तेजाब फेंककर भाग गया था।
              सभ्य समाज में तवायफ़ की मदद केलिए हाथ बढ़ाना संदेह के नज़रिए से देखा जाता है । भद्रजनों के शब्दकोश में उन्हें पतित प्राणी जो कहा गया है। जिनकी परछाई मात्र से दूसरों का धर्म भ्रष्ट हो जाता है। अतः कुछ तो यह भी कह अपनी प्रसन्नता जता रहे थे कि चलो ग्रह कटा, पूरे मुहल्ले में इन नर्तकियों ने गंदगी फैला रखी थी। 
    थोड़े ही देर में पुलिस संग मीडियाकर्मी भी पहुँच गये थे। उनके लिए यह आज की सबसे बड़ी मसालेदार ख़बर थी। सो, वे खंडहरनुमा गंदगी से भरे मकान में नाक दबाये जा घुसे। सारे दृश्यों को फोटोग्राफर दनादन अपने कैमरे में कैद किये जा रहे थे और तेजाब कांड से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़ फ्लैश होने लगी थी। पुलिस भी झुलसी हुईं नर्तकियों को अस्पताल पहुँचा आगे की कार्रवाई में जुट गयी थी ।
     उधर ,अस्पताल बूढ़ी बाई के करुण क्रंदन से काँप उठा था । मानों चारों लड़कियाँ उसकी सगी पुत्रियाँ हो, वैसे भी इन चारों का इस बाई के अतिरिक्त और कोई हितैषी नहीं था। ज़िस्मफरोशी के दलदल में फंसने के बाद वे अपने जन्मदाता तक को भूल चुकी थीं।
    और आज उसी की आँखों के समक्ष इनमें से एक ने दम तोड़ दिया तो दूसरी भी तड़प रही थी। बचना उसका नामुमक़िन था, फिर भी यह बूढ़ी औरत वार्ड में कभी डाक्टर से तो कभी नर्सों से उसकी रक्षा केलिए मिन्नतें करती रही। वे तवायफ़ थी,अतः इनके प्रति उनमें भी कोई सहानुभूति नहीं थी।
         कोठे पर जो लोग उनकी जूतियाँ सीधी किया करते थे। गुलाबो, चमेली और पारो जैसे सुंदर सम्बोधन से इन्हें लुभाते थे। उनमें से एक भी सहायता केलिए नहीं दिख रहा था। जनता के वे रहनुमा जो चर्चित घटनाओं पर आश्वासनों की गठरी लिए मौके पर पहुँच जाते हैं। उनके लिए भी ये सभी ग़ैर थीं ,क्यों कि वे इंसान नहीं तवायफ़ थीं । 
     झुलसी हुई इन लड़कियों की चीख-पुकार और अपनी बेबसी पर बूढ़ी बाई के आँखें बार-बार छलछला उठती थीं। बड़ी ही दीनता के साथ उस बुढ़िया ने पत्रकारों की ओर देखा , परंतु वे तो इसलिए वार्ड का चक्कर मार रहे थें कि दूसरी वाली नर्तकी के दम तोड़ते ही ख़बर अपडेट करा सकें, क्यों कि डाक्टरों ने बता रखा था कि नब्बे प्रतिशत बर्न है।
         उधर, अन्य दो नर्तकियाँ जो कम जली हुई थीं। वे भयभीत आँखों से चारों ओर इसतरह से देख रही थीं , मानों वह शैतान यहीं कहीं छिपा हो । वे कभी अपने बदसूरत हो चुके ज़िस्म पर नज़र डाल विचलित हो चींख उठतीं तो कभी ख़ामोश आँखों को ऊपर की ओर टिका देती थीं । जैसे पूछ रही हो - " ख़ुदाया ! हम दीनों को तू इतना क्यों सता रहा है ?  "
       उनके अश्रुपूरित नेत्रों में अनेक प्रश्न थे। वे जानना चाहती थीं कि क़िस्मत ने उन्हें जिस ज़िस्मफरोशी के धंधे में ला पटका , क्या उसमें उन्होंने किसी प्रकार की मिलावट की ,जो यह भयानक दण्ड मिला ?
          हाँ, जीविका केलिए वे कुछ रुपये पैदा करती हैं,परंतु उन तवायफ़ों ने ज़िस्म के सौदे में ग्राहकों संग कोई मिलावट तो नहीं किया । वे राजा - रंक दोनों को एक जैसा बिना भेदभाव के अपना ज़िंदा गोश्त परोसती हैं। अपनी सिसकियों को छुपा कर अपना ज़िस्म हर रोज़ इनके समक्ष बिखेरती हैं।  शरीर भले ही उनका मैला हो चुका हो, परंतु ग्राहकों संग सौदा उनका उतना ही साफ़ होता है। 
          और वे लोग जो उनकी कोठियों पर पूरी रात पशुओं की तरह उनके बदन को निचोड़ते हैं। इनमें से कोई अफ़सर तो कोई संत होता है। इनके  दोहरे चरित्र पर किसी ने नहीं धिक्कारा, इन्हें तो मान-प्रतिष्ठा और सभी भौतिक सुख प्राप्त है, जबकि वे तवायफ़ इस मिलावट से दूर रह कर भी समाज केलिए कलंक हैं ..?
       हाँ, वे सवाल करती हैं- " यह कैसा न्याय है तुम्हारा ईश्वर ! और आज तुम इतने निर्दयी कैसे हो गये। जो दो मर गयीं ,वे तो तुम्हारी इस मिलावटी, दिखावटी और बनावटी दुनिया से मुक्त हो गयीं , परंतु अब हमदोनों का क्या होगा ? इज्ज़त भरी ज़िदगी की ख्वाहिश तो हमारी तुमने कभी पूरी नहीं की। हम जब कली से कुसुम भी न बनी थीं , तब तुम्हारे इसी सभ्य संसार के भद्रजनों के पाँवों तले रौंदी गयी थीं और अब झुलसा हुआ यह बदसूरत ज़िस्म लिए हम अपने एकमात्र आश्रयस्थल इस कोठे से भी बाहर सिर्फ़ और सिर्फ़ भीख मांगने को विवश होंगे ? बोलो, क्यों मिली हमें इतनी बड़ी सज़ा ?  "
            उनके सवाल वार्ड की दीवार से टकरा कर लौट आ रहे थे, शायद ईश्वर के पास भी उसका जवाब नहीं था..।


         -व्याकुल पथिक

चित्रः गूगल से साभार

21 comments:

  1. उपयोगी।
    अन्य ब्लॉगों पर भी कमेंट दिया करो।

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    1. जी प्रणाम। बिल्कुल उचित कहा आपने।

      मेरी विवशता यह है कि सुबह पौने पाँच से साढ़े सात बजे तक जब अखबार वितरण से खाली हुआ,तो स्नान-ध्यान, भोजन की व्यवस्था, फिर एक पेज समाचार संकलन के लिए भटकना, उन्हें टाइप करना, बस समय निकल जाता है। शाम को फिर से भोजन का जुगाड़ करना और इसी में प्रेस वार्ता आदि भी..।
      ब्लॉग पर तो बस मन का बोझ हल्का करने चला आता हूँँ।
      मेरी इस टिप्पणी को अन्यथा न ले गुरुजी।
      किसी की रचना बिना पढ़े, सिर्फ़ वाह सुंदर मैं नहीं लिख सकता ।🙏

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज रविवार 22 मार्च 2020 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. मंच पर स्थान देने केलिए आपका आभार यशोदा दी।

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  3. शशि भाई, तवायफों की जिंदगी की तकलीफों को बहुत ही सुंदर तरीके से व्यक्त किया हैं आपने।

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    1. जी ज्योति दी, ज़िदगी फ़िर भी ज़िदगी ही है, जीना तो हमसभी को पड़ता है।

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  4. आप का आलेख आंखें नम करने के साथ साथ माथे पर सिलवटें भी
    डालता है।महान तमिल ग्रंथ
    शिलप्पदिका र म् में लेखक ने
    एक वैश्या माधवी से कहलाया है
    कि पुरुष आखिर उसे किस रूप
    में देखना चाहता है?यह पुरुष
    जाति को ही तय करना चाहिए।
    सती कन्नगी,जिन्हें दक्षिण भारत में
    देवी सीता जितना ही आदर प्राप्त
    है, और वैश्या माधवी दोनों के जीवन में नायक कोवलन का
    समान महत्व था।
    शायद इस प्रश्न का उत्तर देने में
    पुरुष जाति ने कोताही की है
    जिसका अंजाम यह हुआ कि
    अब वेश्यावृत्ति कोठों, बदनाम
    गलियों से निकल कर फाइव स्टार
    होटलों,फ्लैटों, से गुजरते हुए
    दफ्तरों, विद्यालयों तक को आगोश
    में लेे चुकी है।
    आपकी लघु कथा समाज के दोहरे
    मान दंड को उजागर करती है,
    ना वैश्या होने से रोक पाया नहीं
    वैश्या के तौर पर जीने काबिल
    छोड़ा गया।धन्यवाद।
    - (श्री अधिदर्शक चतुर्वेदी , साहित्यकार)

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  5. तवायफों की व्यथा का सजीव चित्रण किया है आपने शशि जी । इस घटना से मैं भी परिचित हूँ । घटना को अंजाम देने वाला हमारे ही क्षेत्र का निवासी है और उसे देख कर कभी नहीं लगा कि उसे ऐसा करने का कोई पछतावा था । हमारा समाज ये भूल जाता है कि तवायफें जो समाज की गंदगी नज़र आती है यदि ये ना होती तो आज समाज का चेहरा और वीभत्स होता । वासना की पूर्ति इन्सान आखिर फिर कहीं और तो करता ही न !

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    1. आपने उचित कहा प्रवीण भैया , अधिकांश औरतें परिस्थितिजन्य कारणों से तवायफ़ बन जाती हैं और हमारी सामाजिक व्यवस्था ऐसी है कि वे इस दलदल से कभी बाहर नहीं निकल पाती हैं।
      परंतु इस अर्थ युग में कालेज की लड़कियों का एक ऐसा भी वर्ग है ,जो भौतिक सुख केलिए स्वेच्छा से ऐसा कर रही हैं।
      यह और दुखद स्थिति है। आपकी प्रतिक्रिया मिलती रहे और अपना स्नेह बनाए रखें।

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  6. आपने कॉलेज की लड़कियों के जिस वर्ग की बात की है ऐसी ही कुछ बात मेरी जानकारी में भी है और ये हमारे जिले में भी हो रहा है। मात्र कुछ रुपयों के लिये लड़कियों का एक वर्ग स्वेच्छा से इस कार्य में लिप्त है। ये है भौतिकवाद का डरावना चेहरा।

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    1. आप एक महाविद्यालय के प्राचार्य हैं प्रवीण भैया, तो निश्चित ही वस्तुस्थिति को आप बेहतर समझते हैं।
      साथ ही आप स्वयं भी पत्रकार रहे हैं।

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  7. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (23-03-2020) को    "घोर संक्रमित काल"   ( चर्चा अंक -3649)      पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    आप अपने घर में रहें। शासन के निर्देशों का पालन करें।हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  

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  8. यह एक सच्ची घटना है। संभवतः 15 वर्ष हो गए होंगे। घटना की शिकार सभी महिलाएं लालडिग्गी मुहल्ले के एक तंग गली में किराए का मकान लेकर लगभग प्रत्येक दिन तवायफ़ों के पुराने मोहल्ले त्रिमुहानी में वो किसी सरकारी कर्मचारी की तरह ठीक 10:00 बजे के आसपास आया करती थीं। निश्चित रूप से वे सभी ख़ूबसूरत थीं। लोगों की नज़रों का पड़ना स्वाभाविक था। मेरा कार्यालय उसी रास्ते पर पड़ता था। उन्हें देखकर कौतूहल होता था। वे कहाँ की थीं और किन कारणों से इस पेशे में आईं? उनकी पृष्ठभूमि और जोख़िम भरे व्यवसाय को लेकर चिंता हुआ करती थी। उन्हें देखकर हर दिन मेरे माथे पर बल पड़ जाता था, लेकिन जैसे ही अपने कार्यालय पहुँचता था, फिर उन्हें भूल जाता था। यह लगभग हर दिन की ही मेरी दिनचर्या थी।

    वे सभी ख़ूबसूरत महिलाएँ जब कभी नहीं दिखाई पड़ती थी, तो मुझे चिंता भी नहीं होती थी। एक दिन सुबह मैं उठा तो देखा कि अख़बार के पहले पृष्ठ पर चार युवतियों पर तेज़ाब फेंके जाने का समाचार था। समाचार को जब पढ़ने लगा तो सब साफ़ हो गया कि वही महिलाएं थीं। दरिंदा कौन था, समाचार में यह भी लिखा हुआ था। हृदय पीड़ा से भर उठा। आख़िर उस दरिंदे ने ऐसा क्यों किया? उसने उसका क्या बिगाड़ा था? अजीब संयोग था कि उस दरिंदे से सन् 2010 में मुलाक़ात भी हुई। विचित्र उसका स्वभाव था। सोचने लगा कि कैसे यह उन तवायफ़ों के संपर्क में आया? फिर कुछ साल बाद पता चला कि पड़ोसी के घर में घुसने के कारण उसकी भी हत्या हो गई। उसकी हत्या पर मोहल्ले वालों को कोई अफ़सोस नहीं था। सभी राहत की साँस ले रहे थे। उसकी अपराधी प्रवृत्ति की कई कहानियाँ सुना रहे थे।

    हमेशा की तरह इस बार भी आपने एक सच्ची घटना के आधार पर कहानी लिखी है। निश्चित रूप से आपकी कहानी हृदय को छू जाती है। शशि भाई लिखते रहिए। 💖

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    1. जी अनिल भैया बहुत सुंदर टिप्पणी,
      उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से आभारी हूँ। घटनास्थल पर सुबह मैं भी गया था क्योंकि सांध्य दैनिक होने के कारण सबसे पहले मुझे समाचार ही भेजना था ,परंतु इस हृदय विदारक दृश्य को देख दहल उठा था।

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  9. शशि भाई  , सत्य  आधारित ये कथा पढ़कर  बहुत  वेदना हुई | नारी के सबसे  तिरस्कृत   अवतार  को भी  जीने का हक़ दुनिया में |  शरीर के रूप  में  सबसे कीमती  सम्मान बेचकर वह आजीविका  कमाना चाहे और उसपर भी उसे  कोई जीने ना दे  , इससे बढ़कर   दुखद क्या हो सकता है ?आखिर उसके तन पर  अधिकार  हो सकता है  मन पर नहीं | किसी को तेज़ाब से जलाने वाले कुत्सित मानसिकता वाले लोग उस पीड़ा को क्या जाने ? कोई जो सोचकर भी कांप जाए वे ऐसे कुकर्म कर गुजरते हैं | जो मर गयी सो  छूट गई पर जो विकृत काया लेकर बच गई उनका  क्या  हुआ होगा राम जाने | उनके सुंदर तन के पुजारी थोड़ी संवेदना भी ना दिखा पाए |  बूढी माई का रोदन भी किसी की संवेदना को ना जगा पाया यही है समाज का दोहरा चरित्र |  निशब्द हूँ सब पढ़कर  और व्यथित भी | सभ्य समाज के वो कौन लोग हैं जो  इस  देह   व्यापार के जिम्मेदार हैं ये  आज  तक समझ नहीं पायी हूँ ?

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    1. कुछ चीजों को समझा नहीं जा सकता रेणु दी,
      क्योंकि समाज में मिलावट का रोग बड़ा प्रबल है।
      आपकी टिप्पणी मिली। आपका स्नेहाशीष मिला। मेरे लिए तो इतना ही पर्याप्त है।

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  10. हृदय व्यथित हुआ कहानी पढ़ कर .किसी को जीते जी मार किसी को क्या हासिल हो जाता है समझ से परे है । करूण कथा शशि भाई ।

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    1. बस यही हम भद्रजनों की संसार है ?
      सबकुछ मिलावट ही मिलावट।
      प्रतिक्रिया केलिए आभार मीना दी।

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  11. हृदयविदारक घटना ,साथ
    ही मर्म पर चोट करता सत्य,
    चीख-चीख कर मानवता के विनाश
    और तवायफों की जटिल जिंदगी
    पर सीधा दृष्टि पात ।
    निशब्द।

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    1. जी कुसुम दी कहाँ है , मानवता ?

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yes